कोरोना काल में मध्य प्रदेश के 3500 जूनियर डॉक्टर इस्तीफा देकर हड़ताल पर क्यों चले गए?

मध्य प्रदेश जहां एक तरफ कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है, वहीं सरकार और जूनियर डॉक्टर भी आमने-सामने हैं. राज्यभर के 13 मेडिकल कॉलेजों में तैनात जूनियर डॉक्टरों ने कोरोना काल में अपनी कुछ मांगें रखीं. जब सरकार ने वो मांगें नहीं मानी तो डॉक्टर 31 मई से हड़ताल पर चले गए. शिवराज सिंह सरकार ने सख्ती दिखाते हुए हाईकोर्ट का रुख किया. कोर्ट ने जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को अवैधानिक करार दे दिया. सरकार ने 467 डॉक्टरों के पीजी में नामांकन रद्द कर दिए. इससे नाराज़ होकर अब प्रदेश भर में तकरीबन 3500 डॉक्टरों ने इस्तीफा सौंप दिया है. आइए बताते हैं पूरा मामला.

हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

डॉक्टरों की हड़ताल के मुद्दे पर 3 जून को जबलपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक, हाईकोर्ट ने डॉक्टरों की हड़ताल को गैरकानूनी घोषित कर दिया. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस मोहम्मद रफीक और जस्टिस सुजय पॉल की बेंच ने सख्त टिप्पणी भी की. उन्होंने कहा-

आप डॉक्टर बनते समय मरीजों की सेवा की शपथ लेते हैं. लगता है आप इस शपथ को भूल चुके हैं. लेकिन हमें अपनी शपथ याद है. इसलिए आप 24 घंटे के अंदर काम पर लौटें. कोरोना संकट के बीच में आपकी हड़ताल अस्वीकार्य है. यदि आदेश नहीं मानेंगे तो सरकार को सख्त कार्रवाई करने की छूट है.

कहां कितने डॉक्टरों ने सौंपा इस्तीफा?

हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी जूनियर डॉक्टर काम पर नहीं लौटे. इसे हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना मानते हुए 3 जून की शाम को पीजी फाइनल ईयर के 467 डॉक्टरों के नामांकन रद्द कर दिए गए. ये डॉक्टर जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी से जुड़े भोपाल के जीएमसी सहित 5 मेडिकल कॉलेजों में थे. विस्तार से बताएं तो जीएमसी भोपाल के 95, एमजीएम इंदौर के 91, गजराज कॉलेज ग्वालियर के 71 मेडिकल स्टूडेंट्स हैं. इनके अलावा नेताजी सुभाषचंद्र बोस कॉलेज जबलपुर के 37 और श्यामशाह कॉलेज रीवा के 173 स्टूडेंट्स भी हैं.

इस कार्रवाई के विरोध में 3500 मेडिकल स्टूडेंट्स ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया. इनमें इंदौर के 476, जबलपुर के 350, ग्वालियर के 330, रीवा के 199 डॉक्टर शामिल हैं. डॉक्टर अब हाईकोर्ट और सरकार की कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

जूनियर डॉक्टर्स की मांगें क्या हैं?

# स्टाइपेंड में 24% बढ़ोत्तरी की जाए. स्टाइपेंड 55,000 से बढ़ाकर 68200 किया जाए. 57,000 से बढ़ाकर 70,680 हो. जिनका स्टाइपेंड 59,000 है, उनका 73,160 किया जाए.

# हर साल 6% की बढ़ोत्तरी बेसिक स्टाइपेंड पर दी जाए.

# पीजी करने के बाद एक साल ग्रामीण इलाकों में ड्यूटी करने के बॉन्ड को कोविड ड्यूटी के बदले हटाने के लिए एक कमेटी बनाई जाए.

# कोविड ड्यूटी में काम करने वाले हर जूनियर डॉक्टर को 10 नंबर का गजटेड सर्टिफिकेट दिया जाए, जिससे आगे उन्हें सरकारी नौकरी में फायदा मिले.

# कोविड में काम करने वाले सारे जूनियर डॉक्टर और उनके परिजनों के लिए अस्पताल में अलग से एरिया और बेड रिजर्व किए जाएं. उनको उपचार में प्राथमिकता दी जाए. उनका इलाज फ्री ऑफ कॉस्ट कराया जाए.

# जितने जूनियर डॉक्टर कोविड ड्यूटी में कार्यरत हैं, उनका अधिक कार्यभार देखते हुए उन्हें उचित सुरक्षा मुहैया कराई जाए.

सरकार बोली, हठधर्मिता दिखा रहे हैं डॉक्टर

राज्य में जूनियर डॉक्टर अब आर-पार की लड़ाई के मूड में दिख रहे हैं. मध्य प्रदेश जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन की सचिव डॉक्टर अंकिता त्रिपाठी ने आजतक को बताया-

‘मध्य प्रदेश के करीब 3 हज़ार जूनियर डॉक्टरों ने अपना सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया है. सरकार ने हमारी मांगें नहीं मानीं, बल्कि सिर्फ भरोसा दिया. इसीलिए हमने हड़ताल खत्म नहीं की. हमारी हड़ताल खत्म करवाने के लिए घर पर पुलिस भेजी जा रही है. सरकार बोल रही है कि जूनियर डॉक्टर ब्लैकमेल कर रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं है. अगर ब्लैकमेल करना होता तो तब करते, जब मरीज़ ज्यादा थे. अब तो मरीज़ भी कम हैं तो ब्लैकमेल क्यों करेंगे.

वहीं, जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल और उनके सामूहिक इस्तीफे पर चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि

डॉक्टरों की मांगें माने जाने के बाद भी उनका यह रवैया हठधर्मिता ही दिखाता है.

दैनिक भास्कर की खबर के मुताबिक, सरकार ने डॉक्टरों की ज्यादातर मांगें कमोबेश मान ली हैं. असली पेच दो मांगों पर फंसा है. जूनियर डॉक्टर 10 नंबर का गजटेड सर्टिफिकेट मांग रहे हैं, जिससे सरकारी नौकरी में फायदा मिले. दूसरा, जो डॉक्टर कोविड ड्यूटी पर हैं, उनके लिए पीजी के बाद एक साल के ग्रामीण ड्यूटी बांड को हटाने के लिए कमेटी बने. सरकार इन मांगों को अनुचित मान रही है औऱ राजी नहीं है. इसी पर डॉक्टर अड़े हुए हैं.


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