घर बेचा, कार बेची, देश छोड़ा, अब बन गया दुनिया का चहेता क्रिकेटर!

साल 2017. जून का महीना, ICC चैंपियन्स ट्रॉफी खेली जा रही थी. भारत और पाकिस्तान का ऐतिहासिक फाइनल. हार्दिक पांड्या की लाख कोशिश के बावजूद सरफराज़ की टीम ने ट्रॉफी को भारत से छीन लिया. उसी चैम्पियंस ट्रॉफी में साउथ अफ्रीकी टीम एक बार फिर से चोकर्स का ठप्पा लेकर बाहर हो गई थी. टीम की ICC टूर्नामेंट में एक और हार हुई तो एबी डिविलियर्स ने वनडे टीम की कप्तानी छोड़ दी.

इसी समय के आसपास एक खिलाड़ी हताश-निराश होकर दक्षिण अफ्रीका से अपना बोरिया बिस्तर बांधकर निकलने की सोच रहा था. उस खिलाड़ी ने अगस्त के महीने में डॉमेस्टिक क्रिकेट में दोहरा शतक लगाया और उसके बाद अपनी सारी प्रॉपर्टी, कार और उस मुल्क से जुड़ा सब कुछ बेच वहां से चला गया.

बहुत सारे सवाल ज़हन में आ रहे होंगे. वो खिलाड़ी कौन था, आखिर उसने ऐसा किया क्यों? और वो गया कहां? चलिए आपको डिटेल में सबकुछ बताते हैं.

ऐसा करने के पीछे की बड़ी वजह थी अपने देश के लिए ना खेल पाना. अब वो खिलाड़ी साउथ अफ्रीका को छोड़कर न्यूज़ीलैंड जाना चाहता था. क्योंकि जिस मुल्क में टैलेंट की कदर ही नहीं हुई. वहां रहकर भी क्या ही फायदा.

ये कहानी है 30 साल के पड़ाव पर खड़े किवी बल्लेबाज़ डेवन कॉन्वे की.

डेवन कॉन्वे. फोटो: AP

लॉर्ड्स के ऑनर बोर्ड का सुख हर बल्लेबाज़ को नसीब नहीं होता. कुछ सौरव गांगुली जैसे होते हैं जो पहली पारी खेलने उतरे और बोर्ड पर अपना नाम अमर कर जाते हैं. जबकि कुछ सचिन तेंडुलकर जैसे होते हैं जो ताउम्र सब कुछ हासिल करके भी इस बोर्ड पर खुद का नाम नहीं छपवा पाते.

डेवन कॉन्वे, सौरव गांगुली जैसे हैं. पहले मैच में ही इंग्लैंड के खिलाफ ऐसी बैटिंग कर डाली कि साउथ अफ्रीका के सलेक्टर्स इस टैलेंट को खोने पर सिर पर हाथ रखे बैठे होंगे.

इस कहानी को रिवाइंड करके 2009 में चलते हैं

डेवन कॉन्वे का जन्म साउथ अफ्रीका के जोहांसबर्ग, ट्रांसवाल में हुआ. यहां पर अपने क्रिकेटिंग आइडल्स को देख वो भी साउथ अफ्रीकी टीम के लिए क्रिकेट खेलना चाहते थे. क्रिकेट की शुरुआत भी हो गई थी. 18 साल की उम्र में साल 2009 में उन्होंने लिस्ट ए और फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में अपना डेब्यू कर लिया.

लेकिन यहां पर उनके बल्ले ने वो कमाल नहीं दिखाया. जिससे उन्हें नेशनल टीम में जगह मिले. फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में पहले दोहरे शतक के इंतज़ार में कॉन्वे ने आठ साल लगा दिए. 2009 में डेब्यू करने वाले कॉन्वे का पहला फर्स्ट-क्लास दोहरा शतक साल 2017 में आया. उनका ये दोहरा शतक प्रोविंशियल स्तर पर गॉटेन्ग टीम की ओर से खेलते हुए आया था.

प्रोविंशियल स्तर पर तो कॉन्वे का प्रदर्शन शानदार था. लेकिन दक्षिण अफ़्रीकी घरेलू क्रिकेट में प्रोविंशियल क्रिकेट को दूसरे दर्जे का स्थान हासिल है. यानी भारत के हिसाब से समझे तो अपने डॉमेस्टिक, लिस्ट ए क्रिकेट से नीचे वाला. जबकि नेशनल टीम में आने के लिए आपको इससे ऊपर के स्तर पर प्रदर्शन करके दिखाना होता है. यहां उनका बल्ला ज़्यादा चल नहीं पा रहा था.

शीर्ष स्तर पर वो लॉयन्स टीम के लिए खेले, प्रोविंशियल जैसा प्रदर्शन नहीं दोहरा पाए. इसकी गवाही उनके आंकड़ें भी देते हैं. दक्षिण अफ़्रीका को जब उन्होंने अलविदा कहा तो उनके नाम 12 मैचों में 21.29 की औसत थी. जिसमें उनके नाम सिर्फ़ एक अर्धशतक था.

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डेवन कॉन्वे. फोटो: AP

हालांकि डेवन को लगता है कि उनको घरेलू क्रिकेट के शीर्ष में ज़्यादा मौके नहीं मिले. उन्होंने एक बार कहा था,

“मैं हमेशा टीम से अंदर-बाहर होता रहा, मेरा स्थान कभी भी फिक्स नहीं होता. यहां तक की मैं हमेशा अलग-अलग बैटिंग पोज़ीशन पर खेला, T20 में मैं ओपनर था, तो वनडे में नंबर-5. चार दिवसीय मैचों में तो मुझे तब प्लेइंग इलेवन में रखा जाता था, जब कोई नहीं खेल रहा होता था.”

इंग्लैंड-न्यूज़ीलैंड में से एक का करना था चुनाव

डेवन कॉन्वे के सामने अब तीन रास्ते थे. या तो दक्षिण अफ्रीका में रहकर बेहतर मौके का इंतज़ार करें. या फिर इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड में से किसी एक देश चले जाएं. जहां जाकर इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने के सपने को पूरा करने की कोशिश करें.

कॉन्वे साउथ अफ्रीका छोड़ने से पहले भी इंग्लैंड में हर साल डॉमेस्टिक लीग खेलने जाते ही थे. तो वहां जाकर खेलना बहुत मुश्किल नहीं था. लेकिन न्यूज़ीलैंड में उनके दो दोस्त थे. मैलकम नोफ़ाल और माइकल रिपन. इन दोनों ने कॉन्वे को कन्विंस किया कि

‘यार आ जाओ न्यूज़ीलैंड में आकर ही क्रिकेट खेलो.’

डेवन ने चुना न्यूज़ीलैंड को अपना अगला ठिकाना

बस फिर दोस्तों के कहने पर कॉन्वे ने अगस्त 2017 में साउथ अफ्रीका से वेलिंग्टन की फ्लाइट पकड़ ली. उन्होंने साउथ अफ्रीका में अपना सबकुछ बेच दिया. इसके पीछे का कारण कॉन्वे ने बताया कि वो ना तो वो सब यहां ला सकते थे. और ना ही वो पिछला कुछ भी याद रखना चाहते थे. क्योंकि इससे उनके दिमाग में ये चलता रहता कि क्या उन्हें वापस चले जाना चाहिए.

वैलिंग्टन पहुंचने के बाद कॉन्वे के सामने क्रिकेट खेलने के अलावा खाने-पीने का जुगाड़ करने की भी समस्या थी. क्योंकि यहां पर जीवन चलाने के लिए उनके पास कोई नौकरी नहीं थी. इसलिए उन्होंने विक्टोरिया यूनिवर्सिटी क्रिकेट क्लब में खिलाड़ी के अलावा कोचिंग का काम भी पकड़ लिया.

न्यूज़ीलैंड पहुंच कर किस्मत ने दिया साथ

2017 में जब कॉन्वे वैलिंग्टन पहुंचे तो उन्हें वैलिंग्टन की टीम में खेलने का इंतज़ार था. किस्मत ने साथ दिया और वैलिंग्टन टीम के ओपनर टॉम ब्लंडल को नैशनल टीम से टेस्ट के लिए कॉल आई. वो वेस्टइंडीज़ के खिलाफ टेस्ट खेलने पहुंच गए. उनके जाने पर वैलिंग्टन को एक ओपनर की ज़रूरत थी. बस कॉन्वे इस रोल के लिए फिट थे तो उन्हें लिस्ट ए टीम में पहला मौका मिल गया.

इसके बाद आई बारी टी20 में डेब्यू की. टॉम ब्लंडल की तबीयत खराब होती है. इन्हें फोन जाता है कि आप खेलोगे. कॉन्वे तुरंत खेलने के लिए हामी भर देते हैं.

इसके बाद फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में डेब्यू के लिए न्यूज़ीलैंड इलेवन, इंग्लैंड के साथ एक प्रैक्टिस मैच खेलती है. वहां भी खेलने जाना पड़ता है और इन्हें फिर से डेब्यू का मौका मिल जाता है.

लेकिन साउथ अफ्रीका में हुई गलती को डेवन ने न्यूज़ीलैंड में नहीं दोहराया. घरेलू क्रिकेट में टीम में मिले मौकों को डेवन ने हाथ से नहीं जाने दिया. उन्होंने एक के बाद एक कई बेहतरीन प्रदर्शन किए. साल 2019-20 का सीज़न तो उनके लिए सबसे यादगार रहा और किवी टीम में कॉल का रास्ता भी.

उन्होंने इस सीज़न तीनों घरेलू प्रतियोगिता फर्स्ट-क्लास में प्लंकेट शील्ड, लिस्ट ए में फोर्ड ट्रॉफी और T20 में T 20 सुपर स्मैश में इतने रन बनाए कि कोई और उससे आगे ही नहीं निकल सका.

न्यूज़ीलैंड में घरेलू टीम वेलिंग्टन फ़ायरबर्ड्स की ओर से खेलते हुए डेवनने 17 फर्स्ट मैच खेले. जिसमें 72.63 की बेहतरीन औसत से 1598 रन बनाए. इसमें उनकी सबसे खास पारी पिछले साल के अक्टूबर में आई. जब कैंटरबरी के ख़िलाफ उन्होंने 327 रनों की पारी खेली. जो कि न्यूज़ीलैंड की सरज़मीं पर उनके क्रिकेट इतिहास में सिर्फ़ आठवीं बार हुआ.

# अब कॉन्वे का वो सपना पूरा होने वाला था, जिसके लिए उन्होंने घर, देश, प्रॉपर्टी सब छोड़ दिया था. साल 2020 में उन्हें पहली बार इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने का मौका मिला. कॉन्वे ने T20 क्रिकेट में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ डेब्यू किया और 41 रनों की पारी खेली.

# इसके कुछ ही महीनों बाद बांग्लादेश के ख़िलाफ़ कॉन्वे ने अपने वनडे करियर का भी आगाज़ कर दिया. अब तक वो तीन वनडे खेल चुके हैं. जिसमें उन्होंने एक शतक और एक अर्धशतक बनाया.

# साल 2021 में कॉन्वे ने टेस्ट क्रिकेट में भी डेब्यू कर लिया. कॉन्वे का यह सपना आखिरकार लॉर्ड्स में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सच हुआ, जहां उन्होंने दोहरा शतक लगाते हुए ना जाने कितने रिकॉर्ड्स तोड़ दिए.

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डेवन कॉन्वे. फोटो: AP

चौके के साथ पूरा किया शतक और छक्के के साथ दोहरा शतक

अपनी डेब्यू पारी में डेवन ने शानदार 200 रन बनाए. उनकी इस पारी में 22 चौके और एक छक्का आया. इतना ही नहीं उन्होंने वीरेंद्र सहवाग स्टाइल में अपना शतक और दोहरा शतक पूरा किया. जब डेवन शतक के करीब पहुंचे तो उन्होंने चौका लगाकर अपने पहला टेस्ट शतक बनाया. फिर जब वो पारी के आखिर में दोहरा शतक के पास पहुंचे. तो उन्होंने बेहतरीन छक्के के साथ इस मकाम को हासिल कर लिया.

इस इंट्रस्टिंग मोमेंट के अलावा उन्होंने अपनी पहली टेस्ट पारी में कई रिकॉर्ड्स बनाए और तोड़े भी.

# डेवन इंग्लैंड में डेब्यू पारी में 200 रन बनाने वाले पहले बल्लेबाज़ बन गए हैं.
# जबकि वर्ल्ड क्रिकेट में वो सिर्फ सातवें बल्लेबाज़ हैं जिसने डेब्यू में डबल सेंचुरी बनाई है.
# लॉर्ड्स के मैदान पर टेस्ट डेब्यू करते हुए ये सबसे बड़ा स्कोर है.
# जबकि वर्ल्ड क्रिकेट में वो सिर्फ दूसरे ऐसे ओपनर हैं, जिसने टेस्ट डेब्यू में दोहरा शतक बनाया है.

डेब्यू टेस्ट की इस पारी के बाद डेवन ने अपने उस फैसले को भी सही साबित कर दिया. जिसमें उन्होंने अपना घर, गाड़ी और मुल्क सब छोड़कर न्यूज़ीलैंड चलने का फैसला किया था.


ENGvNZ पहले टेस्ट के पहले ही दिन गांगुली का कौन सा रिकॉर्ड टूट गया? 





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